अंधेरे के बिना, रोशनी की अहमियत कहाँ...
चलो थोड़ा जी ले, अंधेरे में यहाँ.....!
जब तक पेट की आग न झेली,
तब तक थाली में पड़े खाने की अहमियत कहाँ...
जब तक बीमारी की मार न पड़े,
तब तक सेहत की अहमियत कहाँ...
जब तक पथरीले पड़ाव पर चले नही,
तब तक मखमली चादर की अहमियत कहाँ...
जब तक बेरोज़गारी का सर दर्द न आया,
तब तक जेब में पड़े चंद रुपयों की अहमियत कहाँ...
जब तक दुखों का बादल सर पर न छाया,
तब तक खुशियों की अहमियत कहाँ....
जब तक कोई अपना खुद से जुदा न हो,
तब तक रिश्तों की अहमियत कहाँ...
तब तक रिश्तों की अहमियत कहाँ....!!!
-दीक्षा
Nice👌
ReplyDeleteVery true and such a beautiful lines
ReplyDelete,,👏👏👏👌
ReplyDeleteWow 👌
ReplyDeleteExactly 🥺🥺
ReplyDeleteAbsolutely right 😊
ReplyDeleteGood one👍
ReplyDeleteTrue 💯
ReplyDeleteWell words Deeksha😊
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