अहमियत कहाँ

अंधेरे के बिना, रोशनी की अहमियत कहाँ...

चलो थोड़ा जी ले, अंधेरे में यहाँ.....!


जब तक पेट की आग न झेली, 

तब तक थाली में पड़े खाने की अहमियत कहाँ...

जब तक बीमारी की मार न पड़े, 

तब तक सेहत की अहमियत कहाँ...

जब तक पथरीले पड़ाव पर चले नही,

तब तक मखमली चादर की अहमियत कहाँ...


जब तक बेरोज़गारी का सर दर्द न आया,

तब तक जेब में पड़े चंद रुपयों की अहमियत कहाँ...

जब तक दुखों का बादल सर पर न छाया,

तब तक खुशियों की अहमियत कहाँ....


जब तक कोई अपना खुद से जुदा न हो,

तब तक रिश्तों की अहमियत कहाँ...

तब तक रिश्तों की अहमियत कहाँ....!!!


                                      -दीक्षा 

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